गुरु के समीप बैठकर प्राप्त किया गया दिव्य ज्ञान उपनिषद है औऱ इस ज्ञान को यदि किन्हीं अनुभवी, पुरुष से सुना जाये तो उस ज्ञान की दिव्यता का प्रवाह श्रोता में स्वयंमेव होने लगता है। वस्तुतः, हम सभी मूलतः ईश्वर के अंश हैं औऱ हमारा मूल स्वाभाव उस ईश्वर को जानने की तड़प है, विकलता है पर हम उस अज्ञेय, रहस्यमय ईश्वर को अपनी कोरी, सांसारिक बुद्धि से ढूंढ पाने में सर्वथा असमर्थ रह जाते हैं। हमारी उसी असमर्थता को समर्थ करने का राजमार्ग है डॉ अरुण कुमार जायसवाल के द्वारा वर्णित ये उपनिषद वचन। आप एक जिज्ञासा के साथ इसे सुनें औऱ हर हृदय में बैठे, कण कण में विराजमान ईश्वर विषयक जिज्ञासा को न केवल शांत करें अपितु ईश्वर के मार्ग पर बढ़कर ईश्वर से एकाकर होने के स्वर्णिम सूत्र भी खोजकर परम धन्यता से संपृक्त हो उठें। हाँ, आपको उपनिषदवर्णित यह व्याख्या कैसी लगी, यह बताना न भूलियेगा।